सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

#Narsingh_Jayanti_2021:By social worker Vanita Kasani Punjab# Bhagwan_Narasingh_'s story_pujan_vidhi_and_mantra: -Lord Narsingh Jayanti fast is observed on the Chaturdashi of the Shukla Paksha of Vaishakh month. This year 25 May 2021,

#नृसिंह_जयंती_2021: 
By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब
#भगवान_नृसिंह_की_कथा_पूजन_विधि_और_मंत्र :-

भगवान नृसिंह जयंती व्रत वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है। इस वर्ष 25 मई 2021, मंगलवार को यह पर्व मनाया जाएगा। इस दिन भगवान श्री नृसिंह ने खंभे को चीरकर भक्त प्रह्लाद की रक्षार्थ अवतार लिया था।
पुराणों के अनुसार इस पावन दिवस को भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में अवतार धारण किया था। इसी वजह से यह दिन भगवान नृसिंह के जयंती रूप में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। जानिए इस दिन कैसे करें पूजन- 
 
#पूजन_विधि_एवं_मंत्र-:
1. इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठें।

2. संपूर्ण घर की साफ-सफाई करें।
 
3. इसके बाद गंगा जल या गौमूत्र का छिड़काव कर पूरा घर पवित्र करें।
#तत्पश्चात_निम्न_मंत्र_बोले -:
 ♦️भगवान नृसिंह के पूजन का मंत्र - 
 
नृसिंह देवदेवेश तव जन्मदिने शुभे।
उपवासं करिष्यामि सर्वभोगविवर्जितः॥
इस मंत्र के साथ दोपहर के समय क्रमशः तिल, गोमूत्र, मृत्तिका और आंवला मल कर पृथक-पृथक चार बार स्नान करें। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए।
पूजा के स्थान को गोबर से लीपकर तथा कलश में तांबा इत्यादि डालकर उसमें अष्टदल कमल बनाना चाहिए।
अष्टदल कमल पर सिंह, भगवान नृसिंह तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति स्थापित करना चाहिए। तत्पश्चात वेदमंत्रों से इनकी प्राण-प्रतिष्ठा कर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए।
रात्रि में गायन, वादन, पुराण श्रवण या हरि संकीर्तन से जागरण करें। दूसरे दिन फिर पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
इस दिन व्रती को दिनभर उपवास रहना चाहिए।
* सामर्थ्य अनुसार भू, गौ, तिल, स्वर्ण तथा वस्त्रादि का दान देना चाहिए।
 
* क्रोध, लोभ, मोह, झूठ, कुसंग तथा पापाचार का त्याग करना चाहिए।
 
* इस दिन व्रती को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
#भगवान_नृसिंह_के_बीज_मंत्र-:
 
- ॐ श्री लक्ष्मीनृसिंहाय नम:।।
 
#नृसिंह_अवतार_की_कथा- जब हिरण्याक्ष का वध हुआ तो उसका भाई हिरण्यकशिपु बहुत दुःखी हुआ। वह भगवान का घोर विरोधी बन गया। उसने अजेय बनने की भावना से कठोर तप किया। तप का फल उसे देवता, मनुष्य या पशु आदि से न मरने के वरदान के रूप में मिला। वरदान पाकर तो वह मानो अजेय हो गया।

हिरण्यकशिपु का शासन बहुत कठोर था। देव-दानव सभी उसके चरणों की वंदना में रत रहते थे। भगवान की पूजा करने वालों को वह कठोर दंड देता था और वह उन सभी से अपनी पूजा करवाता था। उसके शासन से सब लोक और लोकपाल घबरा गए। कहीं ओर कोई सहारा न पाकर वे भगवान की प्रार्थना करने लगे। देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने हिरण्यकशिपु के वध का आश्वासन दिया।
उधर दैत्यराज का अत्याचार दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा था। यहां तक कि वह अपने ही पुत्र प्रहलाद को भगवान का नाम लेने के कारण तरह-तरह का कष्ट देने लगा। प्रहलाद बचपन से ही खेल-कूद छोड़कर भगवान के ध्यान में तन्मय हो जाया करता था। वह भगवान का परम भक्त था। वह समय-समय पर असुर-बालकों को धर्म का उपदेश भी देता रहता था।

असुर-बालकों को धर्म उपदेश की बात सुनकर हिरण्यकशिपु बहुत क्रोधित हुआ। उसने प्रहलाद को दरबार में बुलाया। प्रहलाद बड़ी नम्रता से दैत्यराज के सामने खड़ा हो गया। उसे देखकर दैत्यराज ने डांटते हुए कहा- 'मूर्ख! तू बड़ा उद्दंड हो गया है। तूने किसके बल पर मेरी आज्ञा के विरुद्ध काम किया है?'
इस पर प्रहलाद ने कहा- 'पिताजी! ब्रह्मा से लेकर तिनके तक सब छोटे-बड़े, चर-अचर जीवों को भगवान ने ही अपने वश में कर रखा है। वह परमेश्वर ही अपनी शक्तियों द्वारा इस विश्व की रचना, रक्षा और संहार करते हैं। आप अपना यह भाव छोड़ अपने मनको सबके प्रति उदार बनाइए।'
प्रहलाद की बात को सुनकर हिरण्यकशिपु का शरीर क्रोध के मारे थर-थर कांपने लगा। उसने प्रहलाद से कहा- 'रे मंदबुद्धि! यदि तेरा भगवान हर जगह है तो बता इस खंभे में क्यों नहीं दिखता?' यह कहकर क्रोध से तमतमाया हुआ वह स्वयं तलवार लेकर सिंहासन से कूद पड़ा। उसने बड़े जोर से उस खंभे को एक घूंसा मारा। उसी समय उस खंभे के भीतर से नृसिंह भगवान प्रकट हुए। उनका आधा शरीर सिंह का और आधा मनुष्य के रूप में था। क्षणमात्र में ही नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु को अपने जांघों पर लेते हुए उसके सीने को अपने नाखूनों से फाड़ दिया और उसकी जीवन-लीला समाप्त कर अपने प्रिय भक्त प्रहलाद की रक्षा की।
श्री_नृसिंह_भगवान_की_जय🙏🏻 🌹

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

SitaShri Ram's wife, Mother 'Janaki' (Other name)By social worker Vanita Kasani PunjabRead in another languagedownloadTake careEditLearn moreThis article is primarily or wholly a

सीता श्री राम की पत्नी, माता 'जानकी' (अन्य नाम) By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब किसी अन्य भाषा में पढ़ें डाउनलोड करें ध्यान रखें संपादित करें Learn more यह लेख  मुख्य रूप से अथवा पूर्णतया  एक ही स्रोत  पर निर्भर करता है । कृपया इस लेख में उचित  संदर्भ  डालकर इसे बेहतर बनाने में  मदद करें । सीता'   रामायण  और रामकथा पर आधारित अन्य ग्रंथ, जैसे  रामचरितमानस ,  कंब रामायण  की मुख्य नायिका हैं । सीता मिथिला(सीतामढ़ी, बिहार) में जन्मी थी, यह स्थान आगे चलकर सीतामढ़ी से विख्यात हुआ। देवी सीता  मिथिला  के नरेश  राजा जनक  की ज्येष्ठ पुत्री थीं । इनका विवाह  अयोध्या  के नरेश  राजा दशरथ  के ज्येष्ठ पुत्र  श्री राम  से  स्वयंवर  में  शिवधनुष  को भंग करने के उपरांत हुआ था। इन्होंने स्त्री व पतिव्रता धर्म का पूर्ण रूप से पालन किया था जिसके कारण इनका नाम बहुत आदर से लिया जाता है। त्रेतायुग में इन्हें सौभाग्य की देवी लक्ष्मी का अवतार कहा गया है। [1] [2] [3] [4] [5] सीता सीता शक्त...

होली by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब//

मुख्य मेनू खोलीं 1 होली हिंदू तिहुआर दुसरी भाषा में पढ़ीं धियानसूची में डालीं संपादन होली   बसंत ऋतु  में मनावल जाये वाला एगो महत्वपूर्ण भारतीय तिहुआर ह। [1]  इ पर्व  हिंदू पंचांग  के अनुसार  फागुन  मास के  पुर्नवासी  के मनावल जाला । [7] होली होली मनावत लोग मनावे वाला हिंदू, [1]  आ कुछ जैन लोग, [2]  नेवार इलाका के बौद्ध [3]  आ अन्य गैर-हिंदू लोग भी। [4] प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक, बसंत के तिहवार मनावे के तरीका एक रात पहिले: होलिका जरावल (सम्मत फूँकल होली के दिन: एक दूसरा पर रंग- अबीर  फेंकल, नाच-गाना, तिहवार पर बने वाला पकवान खाइल। [5] समय हिंदू कैलेंडर  के हिसाब से [नोट 1] 2020 तारीख सोमार, 9 मार्च केतना बेर सालाना फागुन में मनावे जाए वाला होली क त्योहार  होलिका की दहन  की साथ एक रात पहिलहीं से शुरू हो जाला ओइजा लोग एकट्ठा होला, होलिका दहन की आगे कईगो आपन रीति-रिवाज निभावेला आ प्रार्थना करेला। ओकरी अगिला सबेरे रंगवाली होली मनावल जाला, इ एगो रंग महोत्सव की तरह होला जवने में हर केहू शामिल हो ...

. "माल्यहारिणी कुण्ड" एक समय कार्तिक माह में गिरिराज गोवर्द्धन में दीपावली महोत्सव के अवसर पर ब्रजवासी अपनी–अपनी गायों आदि को विविध प्रकार की वेषभूषाओं से सुसज्जित करने में संलग्न थे! गोपियाँ भी अपने–अपने घर से विविध प्रकार की वेषभूषा लाकर गौओं को भूषित कर रही थीं! श्रीराधिका जी भी सहेलियों के साथ माल्यहारिणी कुण्ड के निकट माधवी चबूतरे पर बैठकर सुन्दर–सुन्दर मुक्ताओं से नाना प्रकार के भूषण प्रस्तुत करने लगीं! इसी बीच विचक्षण नामक शुक पक्षी के मुख से श्रीराधिकाजी द्वारा मुक्ता द्वारा विविध प्रकार के श्रृङ्गारों के बनाये जाने की बात सुनकर श्रीकृष्ण श्रीराधिका जी के पास उपस्थित हुए ! और उनसे कुछ मुक्ता माँगे किन्तु श्रीराधिका जी तथा उनकी सहेली गोपियों ने गर्व पूर्वक दो-चार बातें सुनाकर मुक्ता देने के लिए निषेध कर दिया! फिर भी श्रीकृष्ण ने कहा– 'सखियों!' 'यदि तुम अधिक संख्या में मुक्ता नहीं दे सकती हो, तो थोड़े से ही मुक्ता दे दो, जिससे मैं अपनी प्यारी हंसिनी और हरिणी नामक गौओं का श्रङ्गार कर सकूँ!' परन्तु हठीली गोपियों ने श्रीकृष्ण की इस प्रार्थना को भी अस्वीकार कर दिया! ललिताजी तो कुछ उत्तम-उत्तम मुक्ताओं को हाथों में लेकर श्रीकृष्ण को दिखलाती हुई कहने लगी– 'कृष्ण! ये मुक्ताएँ साधारण नहीं हैं, जिनसे तुम अपनी गायों का श्रङ्गार कर सको, ये बड़ी मूल्यवान मुक्ताएँ हैं, समझे?' श्रीकृष्ण निराश होकर घर लौट आये! उन्होंने मैया यशोदा से हठपूर्वक कुछ मुक्ता लेकर यमुना के पनघट के समीप ही जमीन को खोद खोदकर उसमें उन मुक्ताओं को रोप दिया! उस स्थान को चारों ओर से इस प्रकार घेर दिया, जिससे पौधे निकलने पर उसे पशु-पक्षी नष्ट नहीं कर सकें, श्रीकृष्ण प्रतिदिन प्रचुर गो दुग्ध से उस खेत की सिंचाई भी करने लगे! इसके लिए उन्होंने गोपियों से दूध भी माँगा, परंतु उन्होंने उसके लिए भी अस्वीकार कर दिया! बड़े आश्चर्य की बात हुई– दो-चार दिनों में ही उन सारी मुक्ताओं में अंकुर लग गये तथा देखते-देखते कुछ ही दिनों में पौधे बड़े हो गये तथा उनमें प्रचुर मुक्ताओं के फल लग गये! उनसे अत्यन्त सुन्दर-सुन्दर प्रचुर मात्रायें मुक्ताएँ भी निकलने लगी! यमुना जल भरने के लिए पनघट पर आती-जाती हुई गोपियों ने इस आश्चर्चजनक मुक्ता के खेत को मुक्ताओं से भरे हुए देखा! वे आपस में काना-फूँसी भी करने लगीं! इधर श्रीकृष्ण ने बहुत-सी मुक्ताओं को लाकर बड़ी प्रसन्नतापूर्वक घर लाकर मैया के आँचल में रख दिया! मैया ने आश्चर्यपूर्वक पूछा– कन्हैया! तुम्हें इतनी उत्तम मुक्ताएँ कहाँ से मिलीं? श्रीकृष्ण ने उन्हें सारी बातें बतलायीं! अब श्रीकृष्ण सखाओं के साथ अपनी सारी गौओं का श्रङ्गार करने के लिए अगणित मुक्ता मालाएँ बनाने लगे! उनकी गौएँ भी उन मुक्तामालाओं से विभूषित होकर इधर–उधर डोलने लगीं! गोपियों को यह बात बड़ी असहृय हुई उन्होंने भी अपने-अपने घरों से छिपा-छिपाकर बहुत-सी मुक्ताओं को लेकर श्रीकृष्ण जैसी मुक्ता की खेती की! उसे गौओं के दूध से प्रचुर सिंचन भी किया! उन मुक्ताओं से पौधे भी निकले, किन्तु आश्चर्य की बात यह हुई कि उनसे लता उगने लगीं! ऐसा देखकर गोपियाँ बड़ी चिन्तित हुई! उन्होंने सारी घटना सुनाकर श्रीकृष्ण से कुछ मुक्ता के लिए प्रार्थना की! रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण ने अवहेलना पूर्वक मुक्ता देना अस्वीकार कर दिया, परन्तु अन्त में उन मुक्ताओं के बदले उनसे कुछ दान आदि माँगकर उन्हें दिव्य मुक्ता दे दिए! इस प्रकार यह रहस्यपूर्ण लीला इस कुण्ड पर सम्पन्न होने के कारण इस कुण्ड का नाम माल्यहारिणी कुण्ड हुआ! By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"