सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Holli Colorful Holi is celebrated every year. This year, this festival is going to be celebrated on 29 March. By social worker Vanita Kasani Punjab. In such a situation, you must have known that people throw colors on each other on this festival, and drums

 रंग-बिरंगी होली हर साल मनाई जाती है। इस साल यह पर्व 29 मार्च को मनाया जाने वाला है। By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब. ऐसे में आप जानते ही होंगे कि इस पर्व पर लोग एक-दूसरे पर रंग फेंकते हैं, और ढोल बजाकर होली के लोकगीत गाते हैं। इसी के साथ इस दिन घर-घर जाकर लोगों को रंग लगाकर त्योहार को धूमधाम से मनाया जाता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं होली के पौराणिक 


5 लोकगीत…।

अवध मां होली खेलैं रघुवीरा।

ओ केकरे हाथ ढोलक भल सोहै, केकरे हाथे मंजीरा।
राम के हाथ ढोलक भल सोहै, लछिमन हाथे मंजीरा।
ए केकरे हाथ कनक पिचकारी ए केकरे हाथे अबीरा।
ए भरत के हाथ कनक पिचकारी शत्रुघन हाथे अबीरा।
होरी खेलैं राम मिथिलापुर मां
मिथिलापुर एक नारि सयानी,
सीख देइ सब सखियन का,
बहुरि न राम जनकपुर अइहैं,
न हम जाब अवधपुर का।।

जब सिय साजि समाज चली,
लाखौं पिचकारी लै कर मां।
मुख मोरि दिहेउ, पग ढील
दिहेउ प्रभु बइठौ जाय सिंघासन मां।।

हम तौ ठहरी जनकनंदिनी,
तुम अवधेश कुमारन मां।
सागर काटि सरित लै अउबे,
घोरब रंग जहाजन मां।।

भरि पिचकारी रंग चलउबै,
बूंद परै जस सावन मां।
केसर कुसुम, अरगजा चंदन,
बोरि दिअब यक्कै पल मां।।

सरयू तट पर होली
सरजू तट राम खेलैं होली,
सरजू तट।
केहिके हाथ कनक पिचकारी,
केहिके हाथ अबीर झोली,
सरजू तट।

राम के हाथ कनक पिचकारी,
लछिमन हाथ अबीर झोली,
सरजू तट।

केहिके हाथे रंग गुलाली,
केहिके साथ सखन टोली,
सरजू तट।

केहिके साथे बहुएं भोली,
केहिके साथ सखिन टोली,
सरजू तट।

सीता के साथे बहुएं भोली,
उरमिला साथ सखिन टोली,
सरजू तट।

आज बिरज में होली रे रसिया,

आज बिरज में होली रे रसिया,
होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
उड़त गुलाल लाल भए बादर,
केसर रंग में बोरी रे रसिया।

बाजत ताल मृदंग झांझ ढप,
और मजीरन की जोरी रे रसिया।

फेंक गुलाल हाथ पिचकारी,
मारत भर भर पिचकारी रे रसिया।

इतने आये कुंवरे कन्हैया,
उतसों कुंवरि किसोरी रे रसिया।

नंदग्राम के जुरे हैं सखा सब,
बरसाने की गोरी रे रसिया।

दौड़ मिल फाग परस्पर खेलें,
कहि कहि होरी होरी रे रसिया।

होरी खेलत राधे किसोरी

होरी खेलत राधे किसोरी
बिरिजवा के खोरी।
केसर रंग कमोरी घोरी
कान्हे अबीरन झोरी।

उड़त गुलाल भये बादर
रंगवा कर जमुना बहोरी।
बिरिजवा के खोरी।
लाल लाल सब ग्वाल भये,
लाल किसोर किसोरी।

भौजि गइल राधे कर सारी,
कान्हर कर भींजि पिछौरी।
बिरिजवा के खोरी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

SitaShri Ram's wife, Mother 'Janaki' (Other name)By social worker Vanita Kasani PunjabRead in another languagedownloadTake careEditLearn moreThis article is primarily or wholly a

सीता श्री राम की पत्नी, माता 'जानकी' (अन्य नाम) By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब किसी अन्य भाषा में पढ़ें डाउनलोड करें ध्यान रखें संपादित करें Learn more यह लेख  मुख्य रूप से अथवा पूर्णतया  एक ही स्रोत  पर निर्भर करता है । कृपया इस लेख में उचित  संदर्भ  डालकर इसे बेहतर बनाने में  मदद करें । सीता'   रामायण  और रामकथा पर आधारित अन्य ग्रंथ, जैसे  रामचरितमानस ,  कंब रामायण  की मुख्य नायिका हैं । सीता मिथिला(सीतामढ़ी, बिहार) में जन्मी थी, यह स्थान आगे चलकर सीतामढ़ी से विख्यात हुआ। देवी सीता  मिथिला  के नरेश  राजा जनक  की ज्येष्ठ पुत्री थीं । इनका विवाह  अयोध्या  के नरेश  राजा दशरथ  के ज्येष्ठ पुत्र  श्री राम  से  स्वयंवर  में  शिवधनुष  को भंग करने के उपरांत हुआ था। इन्होंने स्त्री व पतिव्रता धर्म का पूर्ण रूप से पालन किया था जिसके कारण इनका नाम बहुत आदर से लिया जाता है। त्रेतायुग में इन्हें सौभाग्य की देवी लक्ष्मी का अवतार कहा गया है। [1] [2] [3] [4] [5] सीता सीता शक्त...

होली by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब//

मुख्य मेनू खोलीं 1 होली हिंदू तिहुआर दुसरी भाषा में पढ़ीं धियानसूची में डालीं संपादन होली   बसंत ऋतु  में मनावल जाये वाला एगो महत्वपूर्ण भारतीय तिहुआर ह। [1]  इ पर्व  हिंदू पंचांग  के अनुसार  फागुन  मास के  पुर्नवासी  के मनावल जाला । [7] होली होली मनावत लोग मनावे वाला हिंदू, [1]  आ कुछ जैन लोग, [2]  नेवार इलाका के बौद्ध [3]  आ अन्य गैर-हिंदू लोग भी। [4] प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक, बसंत के तिहवार मनावे के तरीका एक रात पहिले: होलिका जरावल (सम्मत फूँकल होली के दिन: एक दूसरा पर रंग- अबीर  फेंकल, नाच-गाना, तिहवार पर बने वाला पकवान खाइल। [5] समय हिंदू कैलेंडर  के हिसाब से [नोट 1] 2020 तारीख सोमार, 9 मार्च केतना बेर सालाना फागुन में मनावे जाए वाला होली क त्योहार  होलिका की दहन  की साथ एक रात पहिलहीं से शुरू हो जाला ओइजा लोग एकट्ठा होला, होलिका दहन की आगे कईगो आपन रीति-रिवाज निभावेला आ प्रार्थना करेला। ओकरी अगिला सबेरे रंगवाली होली मनावल जाला, इ एगो रंग महोत्सव की तरह होला जवने में हर केहू शामिल हो ...

. "माल्यहारिणी कुण्ड" एक समय कार्तिक माह में गिरिराज गोवर्द्धन में दीपावली महोत्सव के अवसर पर ब्रजवासी अपनी–अपनी गायों आदि को विविध प्रकार की वेषभूषाओं से सुसज्जित करने में संलग्न थे! गोपियाँ भी अपने–अपने घर से विविध प्रकार की वेषभूषा लाकर गौओं को भूषित कर रही थीं! श्रीराधिका जी भी सहेलियों के साथ माल्यहारिणी कुण्ड के निकट माधवी चबूतरे पर बैठकर सुन्दर–सुन्दर मुक्ताओं से नाना प्रकार के भूषण प्रस्तुत करने लगीं! इसी बीच विचक्षण नामक शुक पक्षी के मुख से श्रीराधिकाजी द्वारा मुक्ता द्वारा विविध प्रकार के श्रृङ्गारों के बनाये जाने की बात सुनकर श्रीकृष्ण श्रीराधिका जी के पास उपस्थित हुए ! और उनसे कुछ मुक्ता माँगे किन्तु श्रीराधिका जी तथा उनकी सहेली गोपियों ने गर्व पूर्वक दो-चार बातें सुनाकर मुक्ता देने के लिए निषेध कर दिया! फिर भी श्रीकृष्ण ने कहा– 'सखियों!' 'यदि तुम अधिक संख्या में मुक्ता नहीं दे सकती हो, तो थोड़े से ही मुक्ता दे दो, जिससे मैं अपनी प्यारी हंसिनी और हरिणी नामक गौओं का श्रङ्गार कर सकूँ!' परन्तु हठीली गोपियों ने श्रीकृष्ण की इस प्रार्थना को भी अस्वीकार कर दिया! ललिताजी तो कुछ उत्तम-उत्तम मुक्ताओं को हाथों में लेकर श्रीकृष्ण को दिखलाती हुई कहने लगी– 'कृष्ण! ये मुक्ताएँ साधारण नहीं हैं, जिनसे तुम अपनी गायों का श्रङ्गार कर सको, ये बड़ी मूल्यवान मुक्ताएँ हैं, समझे?' श्रीकृष्ण निराश होकर घर लौट आये! उन्होंने मैया यशोदा से हठपूर्वक कुछ मुक्ता लेकर यमुना के पनघट के समीप ही जमीन को खोद खोदकर उसमें उन मुक्ताओं को रोप दिया! उस स्थान को चारों ओर से इस प्रकार घेर दिया, जिससे पौधे निकलने पर उसे पशु-पक्षी नष्ट नहीं कर सकें, श्रीकृष्ण प्रतिदिन प्रचुर गो दुग्ध से उस खेत की सिंचाई भी करने लगे! इसके लिए उन्होंने गोपियों से दूध भी माँगा, परंतु उन्होंने उसके लिए भी अस्वीकार कर दिया! बड़े आश्चर्य की बात हुई– दो-चार दिनों में ही उन सारी मुक्ताओं में अंकुर लग गये तथा देखते-देखते कुछ ही दिनों में पौधे बड़े हो गये तथा उनमें प्रचुर मुक्ताओं के फल लग गये! उनसे अत्यन्त सुन्दर-सुन्दर प्रचुर मात्रायें मुक्ताएँ भी निकलने लगी! यमुना जल भरने के लिए पनघट पर आती-जाती हुई गोपियों ने इस आश्चर्चजनक मुक्ता के खेत को मुक्ताओं से भरे हुए देखा! वे आपस में काना-फूँसी भी करने लगीं! इधर श्रीकृष्ण ने बहुत-सी मुक्ताओं को लाकर बड़ी प्रसन्नतापूर्वक घर लाकर मैया के आँचल में रख दिया! मैया ने आश्चर्यपूर्वक पूछा– कन्हैया! तुम्हें इतनी उत्तम मुक्ताएँ कहाँ से मिलीं? श्रीकृष्ण ने उन्हें सारी बातें बतलायीं! अब श्रीकृष्ण सखाओं के साथ अपनी सारी गौओं का श्रङ्गार करने के लिए अगणित मुक्ता मालाएँ बनाने लगे! उनकी गौएँ भी उन मुक्तामालाओं से विभूषित होकर इधर–उधर डोलने लगीं! गोपियों को यह बात बड़ी असहृय हुई उन्होंने भी अपने-अपने घरों से छिपा-छिपाकर बहुत-सी मुक्ताओं को लेकर श्रीकृष्ण जैसी मुक्ता की खेती की! उसे गौओं के दूध से प्रचुर सिंचन भी किया! उन मुक्ताओं से पौधे भी निकले, किन्तु आश्चर्य की बात यह हुई कि उनसे लता उगने लगीं! ऐसा देखकर गोपियाँ बड़ी चिन्तित हुई! उन्होंने सारी घटना सुनाकर श्रीकृष्ण से कुछ मुक्ता के लिए प्रार्थना की! रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण ने अवहेलना पूर्वक मुक्ता देना अस्वीकार कर दिया, परन्तु अन्त में उन मुक्ताओं के बदले उनसे कुछ दान आदि माँगकर उन्हें दिव्य मुक्ता दे दिए! इस प्रकार यह रहस्यपूर्ण लीला इस कुण्ड पर सम्पन्न होने के कारण इस कुण्ड का नाम माल्यहारिणी कुण्ड हुआ! By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"